बस इतना सा कर्ज ?


क्या बस इतना ही कर्ज था बच्ची तुम्हारा ? क्यों बस इतनी ही देर के लिए आई थी 😢,
अश्रु की बूदें पलकों के तीरे बार बार आकर टकरा रही हैं, जैसे समन्दर का विशाल भंवर उतावला हो अपनी सीमाएं लांघ नयनों के असह्य वेदनापूर्ण जंजीरों से आजाद हो जाने को ।
लेकिन क्या करें, प्रक्रिया… जिम्मेदारी….

समय ही नहीं कि खुद से खुद की बात कर सकूं, खुद को एकांत में समझा सकूँ। इसलिये बस लिख दिया ! शायद आखिरी बार !!

पिछले कुछ दिनों से भयानक महामारी के चलते मुम्बई में फंसे हमारे बहुत से भाई बहनों की वेदना को देखते हुये, उनके लिये दिन रात एक करके ट्रैन की व्यवस्था करने का प्रयास कर रहा हूँ, उसकी प्रक्रिया में हजारों लोगों को सांत्वना देते हुये तैयारी को आगे बढ़ाना, साथ मे अपनी आजीविका के लिए नौकरी का घर से काम करने की जिम्मेदारी भी । 1 वीडियो और 1 ऑडियो मीटिंग एक साथ चल रही… की अचानक पिता जी का वीडियो कॉल आता है शायद भाई आशीष के नंबर से, और…. एक नन्ही सी परी.. कौन है ये, बहुत प्यारी है ।
पिता जी ने बताया कि सुबह गाँव की एक झाड़ी में किसी ने एक नवजात बच्ची को छोड़ दिया है, स्वस्थ और जीवित है, गाँव मे खबर आग की तरह फैल गयी, तमाशा सज गया, लेकिन तभी पिताजी के भावनात्मक अंश मेरे छोटे भाई ने हाथ बढ़ाया और उठा लिया उस जान को गोद में ।
बदल गया मंजर, शायद बच्ची ने कई घंटों बाद ममत्व भरे आलिंगन को महसूस किया और निश्चिंत हो सो गई, घर लाई गई तो माँ और पिताजी की ममता का सागर उमड़ पड़ा और उन्होंने सोचा अब ये यहीं रहेगी । गांव के कई लोगों ने उसे पाने की इच्छा जाहिर की इतना निश्छल आकर्षण था उन नन्ही आंखों में,
वीडियो पर पिता जी ने पूछा गार्डियन बनोगे ? मैंने कहा हाँ बिल्कुल, क्या फर्क पड़ता है 1 बेटी है एक और होगी । 2 बच्चे हैं अब तीन होंगे । पिताजी ने फ़ोन रख दिया क्योंकि थाने से प्रशासनिक अमला पधार चुका था,
थानाध्यक्ष जी, चाइल्ड केअर वाले, माननीय पूर्व मंत्री जी, मित्र युवा नेतागण…
मैं फिर व्यस्त हो गया एक ट्रेन का इंतजाम, हजारों लोगों की आशा, मेरी नौकरी……

रात में थोड़ी फुरसत मिली तो वापस कॉल किया और फिर शॉक…. वही…. प्रक्रिया….

उस व्यस्तता में भी एक अजीब सा सूनापन !!😢
बच्ची को प्रक्रिया के तहत चाइल्ड केअर जाना था, और विदा हो गईं चंद घंटों की खुशियां बिखेरकर,

माँ और पापा भी अपने मन का सूनापन बयां करते हुये अपने ही अंदर उमड़ रहे भावनाओं के ज्वार से द्वंदयुद्ध करते दिखे,

छोटे भाई, और बड़े भाई ने मुझसे नजरें नहीं मिलाई, लेकिन मेरी तो नजर हर वक्त उनपर रहती है, भांजा शिवम भविष्य के लिए दर्द को समेटता दिखा ।

शायद थोड़ा ही कर्ज था बच्ची का, जो वो वसूल करने आई थीं, या शायद कोई गुनाह था हमारा, जिसका हिसाब चुकता करना था !
जिंदगी भर की एक याद 18 मई 2020..
लेकिन इतना तो तय है बेटी तुम मुझे मुझसे मिलाने आयी थी शायद, बताने आयी थी ऐसी तमाम बच्चियां चाइल्ड केअर के सुपुर्द हो जाती हैं, लेकिन बाद में उनका क्या होता है ?
तो आज से मेरा एक और रिस्ता जुड़ गया, चाइल्ड केअर सेंटर से, हमेशा हमेशा के लिये, अब सिर्फ तुम ही नहीं ऐसी तमाम बेटियों के बारे में सोचना होगा हमें, और विश्वास रखो, मैं करूँगा !! पूरी शिद्दत से करूँगा

खुश रहो बच्ची,
…..

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